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Friday, July 15, 2011

फिर वही मंजर

फिर वही मंजर
फिर वही शांम
हर और बिखरा है देखो
मौत का सामान
सहमा सहमा सा है
हर शख्स यहाँ
है डर सीने में उसके
की जाए कहा
हर और खून से लथपथ
पड़े हुए है लोग
ये कैसा भयानक मंजर है
किसका है ये दोष
वो मॉस का लोथड़ा बन
पड़ा हुआ है किसी का बाप
वो भाई देख रहा है देखो
खून से लथपथ बहन की लाश
वो रोता बच्चा ढूँढ रहा है
माँ को अपनी यहाँ वहा
वो दादा सोचे खड़ा खड़ा
पोता मेरा गया कहा
चीखती चिल्लाती आवाजे
हर और सुनाई पड़ रही
अपने ही शहर में हमको अपनी
जान पराई लग रही
हर और धुआ ही धुआ है
और है धमाको की गूँज
इस धुए में बोझल हो गयी
जैसे जिंदगी की धूप
इस धुए में बोझल हो गयी
जैसे जिंदगी की धूप